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आसमान में धमाका : 13 हजार फीट से छलांग लगा महिमा छेत्री बनीं बंगाल की पहली महिला स्काई डाइवर
कोलकाता। हौसले बुलंद हों तो आसमान की ऊंचाइयां भी छोटी लगने लगती हैं। उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के एक छोटे से कस्बे मालबाजार की रहने वाली महिमा छेत्री ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। बादलों को चीरते हुए 13 हजार फीट की ऊंचाई से विमान से छलांग लगाना और फिर परिंदे की तरह जमीन पर सुरक्षित उतरना—महिमा के लिए अब यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि उनकी पहचान बन चुका है। उन्हें पश्चिम बंगाल की पहली महिला स्काई डाइवर होने का गौरव प्राप्त हुआ है, जिन्होंने इस साहसिक खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर की दक्षता हासिल की है। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिमा का यह सफर संघर्ष और जुनून की अनूठी मिसाल है। उनके पिता अर्जुन छेत्री, जो सेना से सेवानिवृत्त होकर रेलवे सुरक्षा बल में सेवाएं दे चुके हैं, ने अपनी बेटियों को हमेशा बेटों के बराबर सपने देखने की आजादी दी।
महिमा ने कानून की पढ़ाई पूरी की और वर्तमान में एक पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी में सिक्योरिटी एग्जीक्यूटिव के पद पर तैनात हैं, लेकिन उनका दिल हमेशा नीले आसमान में धड़कता था। अपने सपनों को पंख देने के लिए महिमा ने सात समंदर पार थाईलैंड का रुख किया। वहां उन्होंने एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था से कड़ा प्रशिक्षण लिया और स्काई डाइविंग का ए कैटेगरी लाइसेंस हासिल किया। भारत लौटने के बाद उन्होंने स्काईहाई इंडिया के साथ जुड़कर अपने कौशल को और निखारा। अब तक महिमा 30 से अधिक सफल जंप लगा चुकी हैं, जो किसी भी भारतीय एथलीट के लिए शुरुआती स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि है। महिमा की यह उड़ान जितनी ऊंची है, उसकी राह उतनी ही पथरीली रही है। स्काई डाइविंग दुनिया के सबसे महंगे खेलों में से एक है, जिसमें हर जंप, उपकरण और ट्रेनिंग पर लाखों का खर्च आता है। महिमा ने अब तक अपनी मेहनत की कमाई और कर्ज के सहारे इस जुनून को जिंदा रखा है। उनका लक्ष्य अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा फहराना है, लेकिन इसके लिए उन्हें बड़े स्तर पर प्रायोजकों और सरकारी सहायता की दरकार है। महिमा का कहना है, अगर मुझे उचित आर्थिक सहयोग और संसाधन मिलें, तो मैं एक साल के भीतर 500 जंप पूरे कर वैश्विक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकती हूँ। उनकी मां और परिवार भी उनकी इस हिम्मत के साथ मजबूती से खड़ा है। सीमित संसाधनों के बावजूद महिमा छेत्री की यह कामयाबी बंगाल की उन हजारों बेटियों के लिए एक संदेश है, जो पारंपरिक पेशों से हटकर कुछ अलग करना चाहती हैं। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन और खेल मंत्रालय इस उभरती हुई प्रतिभा का हाथ थामेंगे, ताकि डुआर्स की यह बेटी वैश्विक आसमान पर भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख सके?